उसे भी चाहिए

उसे भी चाहिए ( कविता)
-------------------------- रजनी प्रभा

बेतरह टूटता रहा बदन 
उसने उफ़ तलक न की
उसकी रगों में बहता था
 ईमानदारी की लहू
दो जून की रोटी
 बस इतनी ही उसकी  ख्वाइश थी
वो गुलाब भी बन सकता था
 मगर बना केवल गेहूं ! 

कड़कती धूप
हाड़ कंपाती ठंड
झमकते मेघ
तिस पर खाली घर में
छूटती जा रही थी उसकी
सिहरती भावनाएं
ढहते मकान
सिसकते बच्चे
कराहती पत्नी
खांसती अम्मा
अनव्याही बहन
बेरोजगार बापू
और जलते पेट को
 धधकते आक्रोश में
  भला कैसे झोंक सकता था वो
तभी तो उसने जुबान के साथ_साथ जेहन में भी ताले जड़ लिए
और बन गया  श्रमिक
एक अहद श्रमिक !

मगर आज इस नई पीढ़ी को 
ये दासता मंजूर नहीं
उसे पता है आज 
समय की मांग
कुछ ज्यादा है
पुरानी जंजीरों से 
मुक्त करना है उसे
 श्रमिक की कराहती पहचान को
उसे कहां इनकार  मेहनत से
मगर इस मेहनत की
 कुल्हाड़ी से नहीं कटने देगा
 वो अपनी भावनाएं,मकान,बच्चे, पत्नी,अम्मा,बहन,पिता और पेट को,
अपने कुनबे और समाज के लिए 
वो उठाएगा आवाज
 नपुंसक व्यवस्था के खिलाफ
वो लड़ेगा हर,धूप,ठंड,बारिश और 
रेहन पड़े घर से !

वो श्रम-सृजनकार है ,
फिर क्यों सहे ये अत्याचार
वो प्रतिकार करेगा
हर उस व्यवस्था के खिलाफ़
जिसने उसकी जड़ों में
 गोबर भी न पड़ने दी,
और ....और विदेशी खादों से सींचकर,
 दूसरी नस्ल को बना दिया गुलाब !

अब उसे  और
उसके कुनबे एवं समाज को भी 
गेहूं के साथ गुलाब चाहिए !!

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रजनी प्रभा
पता कुंदन कुमार सिंह, जारंगडीह, गायघाट,मुजफ्फरपुर,बिहार,(843118)
Rajni. prabha22@gmail.com

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