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इश्क़

इश्क़  जो बात तेरी और मेरी थी,, उस बात को जग ने जाना क्यों? जब मशहूर ही होना था तुझको,, तो बनता था मेरा दीवाना क्यों? जब गैरों को लगाया है सीने,, तो मेरी गली में आना जाना क्यों,,, हम ठीक थे, गुम थे ,खुद में ही तूने हमको पहचाना क्यों,,, जो बात तेरी और मेरी थी उस बात को जग ने जाना क्यों,,, मानाकी हम नहीं तेरे काबिल थे,, हक तुझको पर सारे हासिल थे,, खुद छोड़ गया तपती धूप में तू,, फिर खुद को यूं तड़पाना क्यों,, जो बात तेरी और मेरी थी,, उस बात को जग ने जाना क्यों,,, जिद थी तेरी मेरी मर्जी नही,, इश्क सच्चा था मेरा फर्जी नहीं,,, तूने खुद को खुद आजाद किया, फिर गाता है वही अफसाना क्यों,, जो बात तेरी और मेरी थी,, उस बात को जग ने जाना क्यों,,, आंखों में नीर उपहार मिले,, इस इश्क में दर्द हजार मिले,, जब जुर्म किया स्वीकार करो,, इस बात में अब शर्माना क्यों,, जो बात तेरी और मेरी थी,, उस बात को जग ने जाना क्यों,,, वो कौन है जो फिर पग खींच रहा,,, सांसों को मेरे क्यों सींच रहा,, है बात बहुत अल्फाज है कम,,,  इस बात से ’रजनी’ घबराना क्यों,,, जो बात तेरी और मेरी थी,, उस बात को जग ने जाना क्यों,,, र...

उसे भी चाहिए

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उसे भी चाहिए ( कविता) -------------------------- रजनी प्रभा बेतरह टूटता रहा बदन  उसने उफ़ तलक न की उसकी रगों में बहता था  ईमानदारी की लहू दो जून की रोटी  बस इतनी ही उसकी  ख्वाइश थी वो गुलाब भी बन सकता था  मगर बना केवल गेहूं !  कड़कती धूप हाड़ कंपाती ठंड झमकते मेघ तिस पर खाली घर में छूटती जा रही थी उसकी सिहरती भावनाएं ढहते मकान सिसकते बच्चे कराहती पत्नी खांसती अम्मा अनव्याही बहन बेरोजगार बापू और जलते पेट को  धधकते आक्रोश में   भला कैसे झोंक सकता था वो तभी तो उसने जुबान के साथ_साथ जेहन में भी ताले जड़ लिए और बन गया  श्रमिक एक अहद श्रमिक ! मगर आज इस नई पीढ़ी को  ये दासता मंजूर नहीं उसे पता है आज  समय की मांग कुछ ज्यादा है पुरानी जंजीरों से  मुक्त करना है उसे  श्रमिक की कराहती पहचान को उसे कहां इनकार  मेहनत से मगर इस मेहनत की  कुल्हाड़ी से नहीं कटने देगा  वो अपनी भावनाएं,मकान,बच्चे, पत्नी,अम्मा,बहन,पिता और पेट को, अपने कुनबे और समाज के लिए  वो उठाएगा आवाज  नपुंसक व्यवस्था के खिलाफ वो लड़ेगा हर,धूप,ठंड,...