इश्क़
इश्क़
जो बात तेरी और मेरी थी,,
उस बात को जग ने जाना क्यों?
जब मशहूर ही होना था तुझको,,
तो बनता था मेरा दीवाना क्यों?
जब गैरों को लगाया है सीने,,
तो मेरी गली में आना जाना क्यों,,,
हम ठीक थे, गुम थे ,खुद में ही
तूने हमको पहचाना क्यों,,,
जो बात तेरी और मेरी थी
उस बात को जग ने जाना क्यों,,,
मानाकी हम नहीं तेरे काबिल थे,,
हक तुझको पर सारे हासिल थे,,
खुद छोड़ गया तपती धूप में तू,,
फिर खुद को यूं तड़पाना क्यों,,
जो बात तेरी और मेरी थी,,
उस बात को जग ने जाना क्यों,,,
जिद थी तेरी मेरी मर्जी नही,,
इश्क सच्चा था मेरा फर्जी नहीं,,,
तूने खुद को खुद आजाद किया,
फिर गाता है वही अफसाना क्यों,,
जो बात तेरी और मेरी थी,,
उस बात को जग ने जाना क्यों,,,
आंखों में नीर उपहार मिले,,
इस इश्क में दर्द हजार मिले,,
जब जुर्म किया स्वीकार करो,,
इस बात में अब शर्माना क्यों,,
जो बात तेरी और मेरी थी,,
उस बात को जग ने जाना क्यों,,,
वो कौन है जो फिर पग खींच रहा,,,
सांसों को मेरे क्यों सींच रहा,,
है बात बहुत अल्फाज है कम,,,
इस बात से ’रजनी’ घबराना क्यों,,,
जो बात तेरी और मेरी थी,,
उस बात को जग ने जाना क्यों,,,
रजनी प्रभा
कुंदन कुमार सिंह, जारंगडीह, गायघाट,मुजफ्फरपुर,बिहार(843118)
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